राजा पुरुरवा और उर्वशी का विवाह

 विवस्वान मनु के पुत्र श्राद्धदेव थे , श्राद्धदेव की पत्नी का नाम श्रद्धा था । श्राद्धदेव और श्रद्धा के पुत्र सुधुम्र थे । एक बार सुधुम्र महादेव से शापित वन में चले गए । इस वन को महादेव ने शाप दिया था कि, जो भी पुरुष इस वन में आएगा वह स्त्री बन जाएगा इस वन में जाने के बाद सुधुम्र इला नाम की स्त्री बन गए । चंद्रमा के पुत्र बुध ने  इला से विवाह कर पुरुरवा नाम का एक पुत्र उत्पन्न किया । पुरुरवा की उत्पत्ति के बाद इला ने आदि शक्ति की भक्ति कर पूर्ण रूप से पुरुष रूप प्राप्त कर लिया और अपने जीवनकाल के बाद  आदिशक्ति के उस परमधाम में गए जहां से मनुष्य को फिर से लौट कर नहीं आना पड़ता ।

राजा सुधुम्र  के भगवती के धाम जाने के बाद उनके पुत्र पुरुरवा ने राज्य भर संभाला । ये राजा प्रजा की रक्षा में सदा सलग्न  रहते थे तथा बड़े ज्ञानी और धर्मात्मा थे । इन्होंने कई सत्कर्म में किए थे इससे संसार मे इनकी कीर्ति आपार होगयी । इनकी कीर्ति सुनकर स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी इनपर आसक्त होगयी । ऊर्वशी पुरुरवा को अपना पति बनाना चाहती थी । ब्रह्मा जी के शाप के कारण ये पृथ्वीलोक आयी थी । 

पुरुरवा को धर्मात्मा राजा समझकर उसने उनसे विवाह किया । परंतु उर्वशी ने राजा के सामने तीन शर्ते रखी पहली शर्त तो यह थी कि राजा सदा ही उनके दो मेंढ की रक्षा करेंगे, जब भी उनकी रक्षा करने में असमर्थ हो जाएंगे उर्वशी उन्हें छोड़कर चली जाएंगी । दूसरी शर्त यह थी कि वे सदा घृत  ही खाएंगे और तीसरी शर्त थी कि जब भी वे राजा को मैथुन छोड़कर अन्य समय नग्न देखेंगे उन्हें छोड़कर चली जाएंगी ।  राजा ने  सारी शर्तें मान ली , उर्वशी ने शाप से मुक्ति पाने के लिए राजा से विवाह किया और वहीं पर रहने लगे । उस समय राजा के मन और बुद्धि का एक ही लक्ष्य था उर्वशी । वे उस पर इतने आसक्त हो गए थे कि यदि एक क्षण भी उससे दूर रहते तो , अति दुखी हो जाते इस तरह कई वर्ष बीत गए ।

जब देवराज इंद्र ने उर्वशी को स्वर्ग में नहीं पाया तो उन्होंने अपने सेवकों से यह जाना कि उर्वशी ब्रह्मा के शाप  से पृथ्वी लोक में रह रही है । तब उन्होंने अपने सेवकों को आदेश दिया कि उन्हें उर्वशी को फिर से स्वर्ग में लाने का प्रयास करना चाहिए । उन्होंने योजना बनाई की किसी तरह से उर्वशी के दो मेंढे जिन्हें राजा ने सुरक्षित रखने का वचन दिया था उन्हें चुरा लेना चाहिए । तब राजा के सेवकों ने एक दिन रात्रि महल में जाकर घोर अंधेरे में ही उन दोनों मेंढ़ों को चुरा लिया । यह देख कर उर्वशी कहने लगी कि राजा तुम मेरे इन दोनों मेंढ का आरक्षण नहीं कर सके । यह दो मेंढे मुझे मेरे पुत्रों के समान थे । धिक्कार  है तुम पर तुम्हारे जैसे पति को पाकर मैं फस गई ।

उर्वशी की बात सुनकर राजा नंगे ही चोरों के पीछे भागने लगे । तब बिजली कड़की और उर्वशी ने राजा को नग्न देख लिया । राजा को नग्न देखते ही , उर्वशी उसी समय राजा को छोड़कर स्वर्ग को चली गई क्योंकि उसकी शर्त को राजा पूरी तरह से नहीं निभा सके ।  यह देख इंद्र के सेवको ने मेंढ को वहीं छोड़ कर चले गए ।  राजा उन  मेंढे  को लेकर महल में आए जब उन्हें वहां उर्वशी नहीं दिखाई पड़ी तो वे अति दुखी हो गए और दुखी होकर वह देश देशांतर में भटकने लगे ।

एक  वर्ष के बाद जब राजा को कुरुक्षेत्र में उर्वशी मिली तो वे उसे देखकर अति प्रसन्न हुए लेकिन उर्वशी ने उसे मूर्ख कहकर सुखी पूर्वक अपने राज्य में जाकर रहने की सलाह दी।  लेकिन फिर भी राजा को ज्ञान  नहीं हुआ ।  पुरुरवा राजा इतना सब होने के बाद भी दुख से बाहर नहीं आ सके और दुख के सागर में गोता खाते रहे ।



Categories: दुर्गा देवी की कथाएँ

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