वशिष्ट जी का राजा निमि को शाप और भगवती जगदम्बा द्वारा राजा को वरदान

 बहुत पहले की बात है निमि नाम के एक राजा रहते थे , जो बड़े ही धर्मात्मा थे । निमि ने एक समय,  राजसि यज्ञ करने का संकल्प लिया । आवश्यक समस्त वस्तुओं का उन्होंने संग्रह कर लिया , यज्ञ वेदी भी, एक स्वच्छ स्थान ढूंढ कर निर्मित करा दिया । राजा ने वेदी के स्थान पर एक बहुत बड़ा मंडप बनाया था । निमी ने उस यज्ञ के लिए अनेक महात्मा ऋषियों को आमंत्रण भेज दिया ।

वशिष्ट जी, राजा निमि के कुल गुरु थे । इसी कारण से, उनको आचार्य बनाने का निर्णय लिया । निमि अपना आमंत्रण लेकर वशिष्ठ जी के पास गया । निमि की बात सुनकर वशिष्ठ जी कहते हैं , राजन मैंने पहले ही देवराज इंद्र के यज्ञ का आचार्य  का कार्य ले लिया है । जिसकी अवधि 500 वर्षों तक है । इसीलिए मैं पहले इंद्र का कार्य खत्म करके बाद में तुम्हारा कार्य करूंगा । तब तक तुम मेरी प्रतीक्षा करो । वशिष्ठ जी की बात सुनकर निमी कहते हैं, गुरुदेव मैंने सारी सामग्रियों को एकत्रित कर लिया है । अब उन्हें कैसे संभाल कर रखूं , 500 वर्षों तक संभाल कर रखना कठिन है । इसीलिए आप कृपया पहले मेरा यज्ञ करादीजिए और बाद में इंद्र का यज्ञ कराने के लिए जाइए ।

वशिष्टजीने , निमि की एक बात भी नहीं सुनी । वह इंद्र का यज्ञ कराने के लिए चलेगए । इससे महाराज निमि  बहुत ही उदास हो गए । इसके बाद महाराज निमि ने ऋषि गौतम को अपना आचार्य बनाया । राजा निमि ने अपने यज्ञ को आरंभ कर दिया । यज्ञ संपन्न होने के बाद  महाराजने ब्राह्मणों को अनेक उपहार दिया । उधर 500 वर्षों के बाद, वशिष्ट जी इंद्र का यज्ञ संपन्न कराकर आ गए । उनके मन में विचार आया कि , पहले मुझे निमि राजा ने यज्ञ के लिए कहा था । अब मुझे वहां पर जाना चाहिए और देखना चाहिए कि राजा निमि क्या कर रहे हैं । यह सोच कर वशिष्ट जी निमि के महल में गए । वशिष्ट जी ने सैनिकों से कहा कि वे राजा को उनके आने की सूचना दें । किंतु उस समय राजा निमि सो रहे थे, इसीलिए सैनिकों ने उन्हें नहीं उठाया ।

राजा गहरी नींद में थे और इधर वशिष्ठ जी समझ गए कि राजा उनका अपमान कर रहे हैं । वशिष्ट को यह  बात पता चली कि, राजा ने गौतम ऋषि द्वारा अपना यज्ञ संपन्न करा लिया है । राजा के ना आने से , वशिस्ठ जी को क्रोध आगया । वशिष्ट ने  निमी राजा को शाप दे दिया कि,  तुम विदेह हो जाओ । जब सैनिकों ने शाप सुना , तो वे भयभीत हो गए ।  शीघ्र जाकर राजा को उठाया , यह समाचार सुनकर राजा निमि, क्रोधित वशिष्ठ जी के सामने आ गए । महाराज के मन में  कोई भी दुर्भावना नहीं थी । उन्होंने अत्यंत ही मीठे और गंभीर वचन कहना आरंभ किया ।

राजा ने कहा, गुरुदेव आप तो बड़े ही धर्मात्मा व्यक्ति है । फिर भी आपको क्रोध कैसे आ गया । आप जानते हैं कि, मैं निरपराधी हूं , मैंने आपसे बहुत विनती की, किंतु आपने मेरी एक नहीं सुनी । लोभ में पढ़कर इंद्रका यज्ञ कराने चले गए । इसी कारणवश मैंने महर्षि गौतम को आचार्य बनाकर,  अपना यज्ञ कराया । आपने व्यर्थ ही क्रोध में आकर मुझे शाप दे दिया । ब्राह्मणों को कभी क्रोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्रोध चांडाल से भी अधिक अस्पृश्य है । गुरुदेव , ब्राह्मणों को सदैव शांत रहना चाहिए , सदा ही दूसरों का हित करना चाहिए । आप तो स्वयं ब्रह्मा जी के पुत्र हैं, फिर भी आप क्रोध के वश में कैसे हो गए ।  इस क्रोध के वशीभूत होकर आपने मुझ निरपराधी को, अकारण ही शाप दे दिया ।

इतना काहनें के बाद ,राजा ने कहा, गुरुवर अब मैं भी आपको शाप देता हूं ।  जिस क्रोध के कारण आपने मुझे शाप दिया है ,मैं भी आपको शाप देता हूं कि , क्रोध से भरा हुआ आपका यह शरीर नष्ट हो जाए । इस तरह वशिष्ठ और निमि ने एक दूसरे को शाप दे दिया । महाराज निमी को शाप मिल गया यह सुनकर, उनके राज्य के बहुत सारे ऋषियों ने मंत्र द्वारा राजा की आत्मा को उनके शरीर में ही रखा । क्योंकि राजा उस समय यज्ञ की दीक्षा लिए हुए थे । ऋषियोंने उन्हें चंदन आदि लगाया ,अनेक प्रकार की पुष्पों की मालाएं पहनाकर उनके द्वारा यज्ञ भी संपन्न कराया ।

यज्ञ संपन्न होते ही सारे देवता वहां पधारें । ऋषि-मुनियों ने उनका आदर सत्कार किया सारे देवता अति प्रसन्न थे । उन्होंने राजा निमि से कहा, महाराज आप अपना मनोवांछित वर मांग लीजिए । वशिष्टजी के तरह आप देव या मानव किसी भी शरीर को धारण कर सकते हैं । हम उस इच्छाकी पूर्ति अवश्य करेंगे । देवताओं की बातें सुनकर राजा ने कहा, देवराज इंद्र, मैं शरीर धारण करने के चक्र से मुक्त होना चाहता हूं । मैं कोई शरीर धारण नहीं करना चाहता । मेरी इच्छा है कि मैं समस्त प्राणियों के आंखों में वायु बनकर बिहार करता रहूं । जिसके फलस्वरूप, सारे जीव जिस स्थान से देखते हैं , मैं वहां रहूं । यह सुनकर देवताओं ने कहा , राजान, यदि आपकी यह इच्छा है तो, आप भगवती जगदंबा की आराधना कीजिए,वे इस इच्छा को पूर्ण करने में सक्षम है । इस समय देवी भगवती जगदम्बा ,आपके यज्ञ से आप पर अति प्रसन्न है ।

देवराज की बात सुनकर, राजा निमि ने भगवती जगदंबा की स्तुति की । भगवती जगदंबा प्रसन्न होकर उसी समय वहां पर प्रकट हुई । वह सिंह पर विराजमान थी और उनकी शरीर से करोड़ों सूर्य के समान प्रकाश फैल रहा था । देवी ने राजा निमि से कहा, मैं तुम से अति प्रसन्न हूं । मन में जो भी इच्छा हो,  उसे मांग लो, अवश्य ही पूर्ण होगी । यह सुनकर राजा ने कहा, देवी मुझे बंधन से मुक्त करने वाला ज्ञान दीजिए, जिससे मुझे फिसरे ,जन्म- मरण के चक्र में ना पढ़ना हो । राजा की बात सुनकर देवी ने कहा, राजा निमि अभी तुम्हारे कुछ प्रारब्ध कर्म बाकी है।  इसीलिए अभी तुम्हें जन्म – मरण के चक्र से मुक्ति नहीं मिल सकती । किंतु तुम्हें अब शरीर नहीं धारण करना पड़ेगा । तुम समस्त जीवो के नेत्रों में वायु बनकर रहो । मैं तुम्हें ओ विद्या प्रदान करूँगी जिससे तुम जीव मुक्त हो जाओगे । इतना कहकर वहां उपस्थित मुनियों से मिलकर देवी जगदंबा अंतर्धान हो गई ।

उस समय राजा निमि की आत्मा उनके शरीर से निकल गई । परंतु उस स्थान पर उपस्थित ऋषियों ने उस शरीर को नहीं जलाया । काष्ठ आदि लेकर उसका मंथन ,आरंभ किया ताकि उससे राजा का कोई उत्तराधिकारी जन्म ले ले । कुछ समय बाद उस शरीर से एक दूसरा सुंदर बालक प्रकट हो गया । मानो , स्वयं राजा निमि ही हो । अरणीमंथनसे प्रकट होने के कारण, वो बालक मिथि कहे गए ।  पिता के शरीर से उत्पन्न होने के कारण जनक कहलाए ।  निमी के विदेह होने के कारण, उनके कुल में उत्पन्न प्रत्येक राजा  राजा विदेह कहलाये । आगेचलकर उस कुल में उत्पन्न प्रत्येक राजा का नाम जनक हुआ ।

इस तरह निमी राजा ने, वशिष्ठ के दिये हुए शाप को भुगता । देवी जगदम्बा की कृपा से सब के पलकों में वायु बनकर रहते है । इसी कारणवश, उनके कुल में उत्पन्न प्रत्येक राजा को विदेह कहा जाता है ।



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