सुधुम्र राजा को देवी की कृपा से परमधाम की प्राप्ति की कथा

सुधुम्र नाम के एक राजा थे । जो बड़े ही धर्मात्मा थे इनके मुख से कभी भी असत्य वाणी नहीं निकलती थी । एक दिन राजा एक घोड़े पर सवार होकर जंगल में चले गए  , उनके साथ  उनके कई मंत्री थे । जंगल में जाने के बाद उन्हें वहां बहुत ही सुंदर एक वन दिखाई दिया । इस वन में बहुत सारे फल और फूलों के पेड़ थे बहुत सारे पक्षी वहां निवास करते थे ।  ऐसे सुंदर वन को देखकर राजा और उनके मंत्री अति मुग्ध हो गए और उन्हें इस वन में जाने की इच्छा हो गई ।

एक समय की बात है इस वन में अनेक ऋषि भगवान शिव से मिलने के लिए आए थे। उस समय भगवान शिव अपनी प्रिया पार्वती जी के साथ हास-  विलास कर रहे थे । ऋषियों को वहां आए हुए देख पार्वती जी लजा गई और वहां से दूर चली गई । भगवान शिव अपनी पत्नी जी के साथ हास विलास कर रहे हैं यह देख सारे ऋषि गण वहाँ से वैकुंठ को चले गए । तब महादेव जी ने पार्वती जी से कहा तुम क्यों लजा रही हो । मैं अभी तुम्हें सुखी कर देता हूं । मैं इस वन को शाप देता हूं की जो भी पुरुष इस वन में आएगा वह तुरंत ही स्त्री बन जाएगा । जो लोग इस बात को जानते थे वे कभी इस कामवन में नहीं जाते थे ।

राजा सुधुम्र  इस बात से अनभिज्ञ थे  और भगवान शिव से शापित इस वन में राजा सुधुम्र चले गए ।  वहां जाते ही वे एक स्त्री के रूप में परिणित हो गए, इतना ही नहीं उनका घोड़ा भी घोड़ी के रूप में बदल गया ।  सारे मंत्रीगण भी स्त्रियों के रूप में परिवर्तित हो गए । तब राजा बड़े ही चिंता में पड़ गए , वे सोचने लगे की अब मैं अपने राज्य वापस कैसे जाऊं, न जाने किसने मुझे ऐसे ठग लिया । ऐसी चिंता करते हुए  राजा उस वन से बाहर आए और इधर उधर घूमने लगे । स्त्री होने के कारण  वे अपने राज्य नही जा सकते थे और अपने इस शाप से मुक्त होने का मार्ग भी नहीं जानते थे ।

स्त्री बने हुए राजा सुधुम्र का  नाम इला पड़ गया । चंद्रमा के पुत्र बुध की इन पर दृष्टि पड़ी और वे इन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते थे । इला को भी यह बात जच गई और उन्होंने बुध को पति रूप में स्वीकार कर लिया । इलाके गर्भ से बुध ने पुरुरवा नाम के पुत्र को उत्पन्न किया ।

जंगल में रहकर पुत्र को उत्पन्न करने के बाद स्त्री बनी हुई इला अपने गुरु वशिष्ट के पास आकर उन्हें अपना सारा वृत्तांत कह सुनाया । तब वशिष्ठ जी ने भगवान शंकर की आराधना की और इलाको पुरुष बनाने का वरदान मांगा । भगवान शंकर ने अपनी बात झूठी नहीं हो इसीलिए यह वरदान दिया कि, इला एक माह पुरुष बनी रहेगी और एक माह स्त्री ही बनकर रहना पड़ेगा ।  भगवान शंकर से वरदान पाकर इला अपने राज्य में आकर रहने लगी, इला बने हुए राजा सुधुम्र तो एक माह लोगों के सामने आकर अपने राज्य का कार्य संभालते और जब भी स्त्री बने रहते तो एक माह तक अपने महल में ही रहते । बाहर नहीं आते थे इससे प्रजा में बड़े आप्रिय हो गए थे ।

जब पुरुरवा बड़े हुए तो राजा ने उन्हें सिंहासन पर बैठाया और एक जंगल में चले गए । वहां उन्होंने महर्षि नारद जी द्वारा देवीआदिशक्ति के नवाक्षर मंत्र की दीक्षा ली और इसी मंत्र का जाप करने लगे । तब देवी उन पर अति प्रसन्न हुई और उनके सामने प्रकट हुई । राजा ने देखा कि देवी सिंह पर विराजमान है । अपने हाथों में शंख चक्र, गदा ,बाण, भुसुंडि ,कमल आदि लिए हुए खड़ी है । तब राजा के मन को अति हर्ष हुआ और वे देवी की स्तुति करने लगे । देवी तुम्हीं ने समस्त चराचर को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी ही शक्ति से ब्रह्मा ,विष्णु और शिवा भी अपने-अपने कार्य करने में सक्षम है । तुम ही समस्त चराचर को रचती हो और समय आने पर तुम ही इसका अंत कर देती हो । तुम्हारी शक्ति का कोई पार नहीं पा सकता । तुम पुरुष को स्त्री बना सकती हो और स्त्री को पुरुष बना सकती हो । मैं तो यह मानता हूं की ना तुम स्त्री हो ना पुरुष हो , ना ही नपुंसक हो । तुम ना ही निर्गुण हो , ना ही सगुण हो । भक्ति भाव से तुम्हारी आराधना करने वाले भक्तों पर अनुग्रह करने वाली देवी तुम जो भी हो मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं ।

इस प्रकार स्तुति करके सुधुम्र राजा देवी के शरणागत हो गए । देवी उन पर अति प्रसन्न हुई और उन्होंने उन्हें तत्काल ही अपने उस लोक में भेज दिया जहां पर जाने के बाद मनुष्य को फिर से भवसागर रुपी इस संसार में नहीं आना पड़ता और वह जन्म मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है ।



Categories: दुर्गा देवी की कथाएँ

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