श्रीमद देवीभागवत की प्राकट्य की कथा

सरस्वती नदी के तट पर स्थित अपने आश्रम पर महर्षि वेदव्यास अपने पुत्र शुकदेव जी को  विवाह करने के लिए को मना रहे थे । गृहस्थ आश्रम के प्रति उनकी निरसक्ति और इसके कष्टदाई होने की बातों को सुनकर और सदा स्वयं को बंधन में होने की अनुभूति को सुनकर उन्हें भगवान विष्णु की वटपत्र पर बालक रूप में सोए हुए वक्त की कहानी सुनाते हैं ।

पुत्र जब सारी सृष्टि का अंत हो गया और भगवान विष्णु ने स्वयं को बालक रूप में,  जल में एक वतापत्रपर  सोए हुए देखा और अपने चारों और जल ही जल देखा ।  तो वे सोचने लगे की , मैं एक बालक रूप में कैसे परिवर्तित हो गया, मैं कौन हूं इस अताह जल के सागर में मैं कहां से आ गया । किस महान पुरुष ने मुझे यहां लाकर रख दिया और किस महान पुरुष ने मुझे बालक रूप में परिवर्तित कर दिया । जब भगवान विष्णु के मन में ऐसे विचार चल रहे थे तभी उन्हें आधा श्लोक सुनाई दिया – सर्वं खिल्विद मेवां नान्यदस्ती सनातनम ।  अर्थ है कि जो कुछ भी है सब मैं ही हूं मेरे सिवा और कुछ भी नहीं है । 

भगवान विष्णु इस आधे श्लोक को सुनकर विचार करने लगे कि किसने यह श्लोक कहा । यह ध्वनि कहां से आई और मन ही मन उस आधे श्लोक का जाप करने लगे।  तत्पश्चात उनके सम्मुख देवी आदिलक्ष्मी प्रकट हुई वे अत्यंत सुंदर वस्त्र पहने हुई थी उनके मुख का तेज मानो करोड़ों सूर्यो के बराबर था । उनके अगल-बगल कई और देवियां उपस्थित थी जो उनकी स्तुति कर रही थी और उनकी सेवा में लगी थी । तब उन देवी को देखकर विष्णु जी सोचने लगे यह देवी कौन है यहां पर क्यों आई है और इन के अगल-बगल खड़ी हुई ये स्त्रियां कौन है क्या इनोने ही मुझे बनाया है ऐसे सारे विचार उनके मन में उठ रहे थे ।

यूँ विचार कर रहे  विष्णु जी को देखकर लक्ष्मी जी कहती हैं ।  विष्णु तुम क्यों इतने विस्मय – विमुग्ध हो रहे हो देवी आध्याशक्ति के प्रभाव से तुम मुझे भूल गए हो ।  तुम इससे पहले हुई अनेक सृष्टियों को भूल गए हो । तुमने कही बार दुष्ट राक्षसों का अंत करने के लिए अवतार धारण किया है । देवी आदिशक्ति निर्गुण परब्रह्म है और तूम उन्हीं के स्वरूप सगुण परब्रह्मा हो । उसी तरह मैं भी सगुण शक्ति हूं । अभी कुछ ही समय में तुम्हारे नाभि  से एक कमल की उत्पत्ति होगी जिसमें ब्रह्मा  जी प्रकट होंगे और तुम्हारे क्रोधित होने पर तुम्हारे भौंए से रुद्र का अवतरण होगा । ब्रह्मा, तुम और शिव तीनों मिलकर इस सृष्टि के सृजन,पालन और संहार के कार्य में लग जाओ ।

देवी की यह बातें सुनकर विष्णु जी कहने लगे देवी अभी कुछ ही समय पूर्व मैंने आधा श्लोक सुना था उस श्लोक को किसने कहा था  मुझे बताने की कृपा कीजिए ।

लक्ष्मी जी कहती है विष्णु जिस आधे श्लोक को तुमने सुना था उसे निर्गुण स्वरूपा परम आध्या शक्ति ने ही कहा था । तुम यह बात ठीक से जान लो कि यह आधा श्लोक ही श्रीमद् देवी भागवत पुराण कहलाता है । सदैव इसका चिंतन करो यह सारे वेदों का सार है और समस्त श्रुतियों  का रहस्य इसमें छिपा है । इसे जानने के बाद संसार में कुछ और जानने योग्य नहीं रह जाता । देवी की बातें सुनकर विष्णु जी ने आधे श्लोक का जाप करना आरंभ कर दिया और देवी अंतर्धान हो गई ।

ब्रह्मा जी ने जब देखा कि विष्णु जी श्लोक का जाप कर रहे हैं तो उन्होंने उन्हें पूछा कि यह श्लोक क्या है ।  मुझे बताने की कृपा कीजिए, तब विष्णु जी ने इस देवी भागवत को ब्रह्मा जी को सुनाया उसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र नारद को सुनाएं ।

वेदव्यास जी कहते हैं, पुत्र शुकदेव मैंने नारद जी से वही श्लोक सुना है और  द्वापर युग के अंत तक यह आधा श्लोक एक बड़े ग्रंथ के रूप में परिवर्तित हो गया और मैंने भी उसे विस्तार से 12 स्कन्धों में विभाजित किया है । तुम इसी श्रीमद् देवी भागवत पुराण का श्रवण करो जिससे तुम्हारे सारे संदेह दूर हो जाएंगे और तुम जीवमुक्त हो जाओगे ।

श्रीमद् देवी भागवत के उत्पत्ति किया तथा अत्यंत सुखदाई है । सर्वप्रथम श्रीमद् देवी भागवत को स्वयं आदिशक्ति ने भगवान विष्णु को सुनाया था जो आगे चलकर उन्होंने ब्रह्मा जी को सुनाया और ब्रह्मा जी ने उनके पुत्र नारद को और नारद जी ने महर्षि वेदव्यास को सुनाया ।



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