शुकदेव जी के विहाव की कथा

महर्षि वेदव्यास सरस्वती नदी के तटपर अपने आश्रम में निवास करते थे । उनके आश्रम पर स्थित दो गौरैया पक्षियों को अपने बच्चों से लाड प्यार करते देख उनके मन में भी पुत्र प्राप्ति की इच्छा उत्पन्न हुई । तब उन्होंने  तप करके भगवान शंकर द्वारा पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया । घृताची नाम की स्वर्ग की अप्सरा को देखकर उनके मन में काम का संचार हो गया और उनका वीर्य लकड़ी पर गिर गया , जिससे एक बालक की उत्पत्ति हुई । घृताची नाम की अप्सरा सुग्गी के रूप में महर्षि के सामने आई थी इसीलिये बालक का नाम शुकदेव रखा गया ।

शुकदेव जी ने देवगुरु बृहस्पति के पास जाकर सारे विद्या ग्रहण की । समस्त वेदों का अध्ययन किया और गुरु दक्षिणा देकर अपने आश्रम को आ गए।  पुत्र को आये देख महर्षि वेदव्यास को अति प्रसन्नता हुई । और उन्होंने शुकदेव जी को वहीं पर रख लिया । कुछ दिनों पश्चात महर्षि वेदव्यास ने अपने पत्र से कहा पुत्र अब तुम विवाह कर लो । विवाह करने से पितर और सारे देवता अति प्रसन्न होते हैं । गृहस्थ आश्रम में रहकर सारे कर्तव्यों का पालन करो और मुझे सुखी करो ।

अपने पिता की यह बातें सुनकर सुखदेव जी ने कहना आरंभ किया , पिताश्री गृहस्थ आश्रम बड़ा ही दुख कर होता है । विवाह करने के बाद मैं स्त्री के वश में हो जाऊंगा और अपनी स्वतंत्रता खो बैठूंगा । मुझे सदा उसके अनुकूल ही कर्म करने पड़ेंगे और जो व्यक्ति अपने बच्चे और पत्नी के इच्छा पूर्ति में डूबा रहता है,  क्या कभी इस संसार से मुक्त हो सकता है । इस संसार में कौनसा सुख है , सारे सुखों में कहीं ना कहीं दुख अवश्य देखा गया है । इसीलिए आप मुझे गृहस्थ बंधन में क्यों धकेल रहे हैं , ऐसी बाते कहकर शुकदेव जी ने विवाह करने से इंकार कर दिया ।

अपने पुत्र की बात सुनकर वेदव्यास जी कहते हैं बेटा गृहस्थ होना ना बंधन है , ना ही बंधन का कारण है । जिसका मन गृहस्थ आश्रम में आसक्त नहीं होगा वह गृहस्थ होते हुए भी मुक्त हो जाता है । ईमानदारी पूर्वक आए हुए  पैसों से धर्म कार्य में लगा रहे । पवित्रता रखें और सदा सत्य वचन बोले । तो वह मनुष्य गृहस्थ होते हुए भी मुक्त हो जाता है । वानप्रस्थ सन्यासी सभी लोग गृहस्थों के घर भिक्षा के लिए आते हैं । उन सब को भिक्षा देखें यह गृहस्थ अनेक धर्म कार्य करता है इसके कारण वह मोक्ष का भी अधिकारी बन जाता है । इतना सब कहने के बाद भी शुकदेव जी विवाह के लिए नहीं माने तब वेदव्यास जी बड़ी चिंता में पड़ गए ।

अपने पिता को चिंतित देख शुकदेव जी कहने लगे । यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि आप जैसे महात्मा और वेद के ज्ञानी पुरुष भी आज माया से मोहित हो गए हैं । जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव  भी माया से मुक्त नहीं हो सके वे  सदा माया के ही अधीन रहते हैं , तो मनुष्य का क्या कहना । मैं उन देवी योगमाया को प्रणाम करता हूं , इन्हीं देवी योगमाया के अधीन होने के कारण विष्णु जी अनेकों अवतार धारण करके संसार में विचरण करते हैं । पिताश्री मैं सदैव बंधन में होने का अनुभव करता हूँ , यह भाव मेरे मन से अलग नहीं होता इसीलिए आप मेरी सहायता कीजिए । मैंने तो अपने गुरु को भी गृहस्थ आश्रम में बंधा हुआ है , वे सदा मुक्ति की राह देखते रहते है । उनकी परिस्थिति ऐसी है की कोई बीमार वैद्य दूसरों की बीमारी दूर करने का प्रयास कर रहा हो ।

अपने पुत्र की बात सुनकर वेदव्यास जी कहते हैं , पुत्र तुम अपनी सारी शंकाओं का निवारण करने के लिए मेरे द्वारा रचित देवीभागवत पुराण का श्रवण करो । इसके श्रवण से तुम्हारे सारे संकट निवारण हो जाएंगे । तब शुकदेव जी ने देवीभागवत कथा श्रवण किया । किंतु इसके बाद भी उनके मन में कुछ संदेह बने रहे । तब महर्षि वेदव्यास ने अपने पुत्र को मिथिला नरेश जनक से मिलने के लिए कहा । वेदव्यास जी कहते हैं, पुत्र तुम  जनक राजा से मिलो क्योंकि अपने समस्त कार्य करते हुए भी वे  संसार में जीवमुक्त है । मुझे विश्वास है कि हमसे मिलने के बाद तुम्हारे सारे संदेह दूर हो जाएंगे और तुम अवश्य ही मेरी बात मान लोगे ।

इसके बाद शुकदेव जी राजा जनक की नगरी मिथिला जाकर उनसे भेंट करते हैं और अपने सदैव बंधन में रहने के आभास के विषय में चर्चा करते हैं । तब जनक जी उन्हें अपना वृतांत सुनाते हैं और कहते हैं कि शुकदेव जी यदि किसी भी वस्तु में ममता नहीं रहे तो मनुष्य सदैव मुक्त रहता है । फिर चाहे कोई वस्तु उसके पास हो या नही । इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह निरासक्त होकर  संसार में अपना कर्तव्य निभाएं और सदा सुखी रहे । इस तरह जनक जी ने शुकदेव जी के अनेकों संदेह का निवारण किया । इसके बाद वे सुखी होकर अपने पिता के पास लौट आए और विवाह करने के लिए मान गए ।

 शुकदेव जी ने तत्पश्चात पितरों की कन्या से विवाह किया और उनसे चार पुत्र और एक पुत्री की उत्पत्ति की कुछ दिनों बाद अपनी पुत्री का विवाह करके सुखी रहे। तत्पश्चात समाधि में लीन होकर अपने शरीर को त्याग कर ब्रह्म स्वरूप होगए ।



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