शुकदेवजी के गृहत्याग की कथा

शुकदेव जी महर्षि वेद व्यास के औरस पुत्र थे । इनका जन्म महर्षि वेद व्यास के वीर्य का घृताची नाम की स्वर्ग की अप्सरा को देख लकडीपर गिरने से हुआ था । उस वक़्त ओ अप्सरा वेदव्यास जी से डर गई थी इसिलोये उसने सुग्गी का रूप बनालिया था । इसी कारणवश वेदव्यास के वीर्य से उत्पन्न उस बालक का नाम शुकदेव रखा गया था । शुकदेव जी अयोनिज थे और भगवान शंकर के वरदान से उनका जन्म हुआ था ।

शुकदेव जी ने कुछ समय बाद देवगुरु बृहस्पति जी से समस्त वेदों का अध्यन किया और बाद में उनके पिता ने उन्हें आश्रम पर ही रख लिया । वे हमेशा वेद अध्ययन में ही रहते । कुछ वर्ष बीतने के बाद वेदव्यास जी ने उन्हें विवाह के लिये कहा तो शुकदेव जी ने गृहस्थ जीवन को कष्ट दायीं बताते हुए मना लार दिया था और स्वयं को यह जीवन भंधन सा लगता  है इस बातका अपने पिता को कहा । वेदव्यास जी ने उन्हें अपनी इस दशा से मुक्त होने के लिए देवी भागवत पुराण के श्रवण का उपाय सुझाया परंतु जब देवी भागवत श्रवण से भी उनके सारे संदेह नही मीठे तो शुकदेव जी को मिथिला नरेश जनक जो जीव मुक्त होने के कारण विदेह के नाम से जाने जाते है उनसे मिलने को कहा । राजा जनक से मिलकर शुकदेव जी के सारे संदेह मिट गए और वे पिता के आश्रम आकर विवाह के लिए मान गए ।

शुकदेव जी का विवाह पितरो की कन्या पिवरी से हुआ । अपनी पत्नी से शुकदेव जी ने चार पुत्र जिनके नाम थे – कृष्ण , गैरप्रभ, भूरी, देवश्रुत और एक पुत्री उत्पन्न की जिनका नाम था कीर्ति । कीर्ति का विवाह शुकदेव जी ने विभ्रजकुमार महामना अणुहके साथ किया । 

इसके बाद शुकदेव जी ने अपने पिता वेदव्यास जी का साथ छोड़कर कैलाश के सुरम्य शिखरपर गये वहाँ उनोहनें अविचल समाधि लगा ली और कुछ समय बाद अपने शरीर को त्यग कर परब्रह्म में लीन होगए ।  यह जानकर वेदव्यास जी को बहोत दुख हुआ वे सदा दुख में रहने लगे । महादेव जी ने वेदव्यास जी पर अनुग्रह कर के उन्हें शुकदेव जो के ज्योति स्वरूप के दर्शन कराए उसे देख वेदव्यस जी का दुख दूर हुआ और वे अपने आश्रम वापस आगये ।

इस तरह महान योगी और व्यास पुत्र शुकदेव जी ने अपना शरीर त्याग कर समाधि ली थी ।



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