मधु कैटभ को देवी के वरदान और उनके साथ भगवान विष्णु के युद्ध की कथा – भाग 2

ब्रह्मा जी को देखकर दोनों दैत्य कहने लगे, तो तू भागकर यहां पर आ गया है और इस चार हाथ वाले पुरुष के सामने खड़ा है । ठीक है हम पहले इस चार हाथ वाले को मारेंगे बाद में तेरा अंत कर देंगे । इनकी बातें सुनकर विष्णु जी ने कहा युद्ध करने की तुम दोनों की इच्छा मैं अवश्य पूरी करूंगा और देखते ही देखते मधु कटक और भगवान विष्णु में युद्ध छिड़ गया वह दोनों दैत्य बारी-बारी भगवान विष्णु से युद्ध करते ।  भगवान विष्णु अकेले ही  दोनों दैत्यों के साथ युद्ध कर रहे थे , उनसे युद्ध करने से भगवान विष्णु थक गए थे । 5000 वर्षों तक उन्होंने युद्ध किया लेकिन फिर भी दोनों दैत्यों  को हरा ना सके और इन दोनों दैत्यों को थोड़ी भी थकावट नहीं हुई । यह सब देख कर भगवान विष्णु ने सोचा –  क्या ऐसा कारण है जिसके वजह से मैं इन दोनों दैत्यों को मार नहीं पा रहा हूं । जब भगवान विष्णु थके हारे हुए थोड़ी देर खड़े थे तब मधु और कैटभ ने कहा क्या हुआ चारभुजा वाले थक गया बस क्या इतनी ही तेरी शक्ति है , आ यहां और  हम से लड़ । 

दैत्यों की ऐसी ललकार सुनकर भगवान विष्णु ने कहा, तुम दो हो और मैं एक ही हूं युद्ध की यही नीति है कि, यदि तुम को बार-बार विश्राम करने का अवसर मिल रहा है तो , मुझे भी विश्राम करने का अवसर मिलना चाहिए । बलवान पुरुष थके हारे हुए और कमजोर से कभी युद्ध नहीं करते इससे उनकी संसार में आपकीर्ति होती है । इसीलिए तुम मुझे थोड़ा विश्राम कर लेने दो जब मैं पूरी तरह फिर से युद्ध करने के लिए तैयार हो जाऊं तब तुम्हारी यह युद्ध की अभिलाषा अवश्य पूर्ण कर दूंगा । फिर से युद्ध होगा यह जानकर  दोनों दैत्य युद्धभूमि से कुछ दूर जाकर खड़े हो गए । जब भगवान विष्णु ने देखा कि दोनों दैत्य युद्ध भूमि से  दूर चले गए हैं तो वे ध्यान में लग गए ।

ध्यान में उन्होंने यह जाना की देवी आदिशक्ति ने इन दोनों दैत्यों को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया है । इसीलिए यह दोनों  मुझ से परास्त नहीं हो रहे हैं । तब विष्णु ने सोचा इस संसार में तो बीमार और अति दुखी इंसान भी मरना नहीं चाहता, चाहे परिस्थिति कैसे भी हो वह जीना ही चाहता है । जब लोग कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपनी मृत्यु नहीं चाहते तो यह दो दैत्य जो अति बलवान और हष्ट पुष्ट है, यह अपनी स्वेच्छा से मेरे हाथों क्यों मारेंगे । अब मुझे क्या करना चाहिए ऐसा कौन सा उपाय है जिससे इन दोनों की मृत्यु हो,  ऐसा सोचकर  भगवान विष्णु इस निर्णय पर पहुंचे कि मुझे आदिशक्ति के शरण में ही जाना चाहिए । क्योंकि इस समय वही इन दोनों  को मारने में मेरी सहायता करेंगे । तब उन्होंने आद्या शक्ति जगदंबा का ध्यान किया ।

विष्णु जी के स्मरण करते ही देवी योगनिद्रा उनके सामने उपस्थित हो गई और उनसे कहा विष्णु तुम फिर से इन दोनों दैत्यों को युद्ध के लिए ललकारो । मैं अपनी माया से इन दोनों को ठग लूंगी , तब तुम इन दोनों को मार देना । देवी की बात सुनकर विष्णु फिर से युद्ध भूमि में गए, उन्हें  युद्ध भूमि में देखकर मधु और कैटभ को बड़ा हर्ष हुआ और फिर से युद्ध आरंभ हो गया । जब भगवान विष्णु फिर से थकने लगे तो उन्होंने निराश होकर देवी की ओर देखा और मन ही मन उनसे सहायता मांगी । तब देवी ने अपनी तिरछी नजरों से इन दोनों दैत्यों को मोहित कर दिया । देवी को देखकर यह दोनों दैत्य मोह में पड़ गए । जब विष्णु जी ने देखा कि  दोनों  मोह  में पड़ गए है , भगवान विष्णु ने उनसे कहा मधु और कैटभ मैं तुम्हारे युद्ध कौशल से अति प्रसन्न हूं , इसलिए तुम्हें वर देना चाहता हूं । तुम्हें जिस किसी वरदान  की अभिलाषा हो वह मुझ से मांग लो । भगवान की यह बातें सुनकर वह दो अभिमानी दैत्य  देवी योगमाया के माया में आकर कहने लगे ,विष्णु तुम खुद हम दोनों को नहीं मार पा रहे हो और कितने थके हारे हो , तुम क्या हमें वर दोगे हम स्वयं ही तुम्हें वरदान देना चाहते हैं,  तुम्हें जो इच्छा हो वह वर हम से मांग लो ।

दैत्यों के यूँ कहने पर , भगवान विष्णु ने उन दोनों से कहा , मधु और कैटभ यदि तुम मुझे वर देना चाहते हो तो अभी यह वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथों से मारे जाओ । विष्णु जी की यह बातें सुनकर उन दोनों दैत्यों को यह मालूम पड़ गया कि वे दोनों ठगे गए । उन्होंने विष्णु से कहा कि तुम सत्यव्रत हो, कभी झूठ नहीं कहते । अभी तुमने कहा था कि तुम हम दोनों को वर देना चाहते हो, इसीलिए हमारी यही इच्छा है कि तुम हमें उस स्थान पर मारो जहां पर जल ना हो । तब विष्णु ने तथास्तु कहकर अपना विराट रूप धारण कर लिया और अति विकराल शरीर वाले उन दोनों दैत्यों को सिर अपनी जांघ पर रख कर , सुदर्शन चक्र से उन दोनों के सर को धड़ से अलग कर दिया । इस तरह इन दोनों दैत्य मधु और कैटभ का भगवान विष्णु ने देवी योग निद्रा की सहायता से अंत किया था ।

मधु और कैटभ के शरीर से ही यह पृथ्वी बनी है , इसीलिए इसे मेदिनी कहा जाता है और इसी कारणवश मिट्टी नहीं खाई जाती ।



Categories: श्री कृष्ण की कथाएँ

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