सूरथ नाम के राजा और समाधि नाम के वैश्य पर देवी की कृपा की कथा

बहुत पहले की बात है सूरथ नाम के एक राजा थे जो प्रजा का अपने पुत्रों की तरह पालन करते थे । एक समय सूरत राजा की दुश्मनी कोला विध्वंसी नाम के क्षत्रियों से हो गई ।  युद्ध में सेना की संख्या अधिक होने के बावजूद भी राजा सूरथ कोला विध्वंसियों से हार गए और केवल अपने ही नगर के राजा बनकर रहने लगे जो अति सुरक्षित था । वहां भी उनके दुष्ट मंत्रियों ने शत्रु से हाथ मिला लिया और उनसे नगर का राजकाज हथिया लिया । इससे राजा सूरथ अति दुखी हो गए और वे अपने पत्नी , पुत्रों को नगर में ही छोड़कर एक घोड़े पर बैठकर शिकार खेलने के बहाने घने जंगल में चले गए । उस जंगल में जाकर वे मेधा मुनि के आश्रम पर रुके जहां पर मुनि ने आदर सत्कार के साथ उनका स्वागत किया और रहने के लिए एक कुटिया भी दी । 

समाधि नाम का एक अत्यंत ही धनवान कुल का वैश्य था उसकी धर्म मे बड़ी आस्था थी । वह सदा दुखी लोगों की सहायता करता , उनके काष्ठ दूर करने का प्रयास करता । सदा सत्य बोलना उसका स्वभाव ही था ।उसके पत्नी और पुत्र अत्यंत ही लोभी थे । धन के लोभ में आकर समाधि के पत्नी और पुत्र ने उसे घर से बाहर निकाल दिया था । इसी कारणवश समाधि नाम का वैश्य अपना घर और गांव त्याग कर घने जंगल में आ गया था और वह भी मेधा ऋषि के उसी आश्रम पर  रहने लगा था जहां पर सूरथ नाम के राजा भी अपने राज्य को त्याग कर निवास कर रहे थे । ऋषिवर के आश्रम पर रहते हुए समाधि नाम के वैश्य सदा इस चिंता में लगे रहते थे की उनकी पत्नी और पुत्र किस हालत में होंगे और उन्हें किसी तरह की समस्या तो नहीं होगी । वे लोग काष्ठ तो नही भोग रहे होंगे ।

मेघा ऋषि के आश्रम पर रहते हुए राजा सूरथ एक दिन पेड़ के नोचे बैठे थे वे बहुत ही चिंतित थे उनके मन में सदा यही चिंता लगी  थी कि मेरा राज्य कैसे होगा । पता नहीं बहुत मेहनत से कमाया हुआ मेरा धन अब वहां के राजा कैसे खर्च कर रहे होंगे । हो सकता है वह लोग बेकार के कामों में मेरा धन बर्बाद कर रहे होंगे , जो धन मैं दान धर्म मे लगता था अब शायद वो धूर्त म्लेच्छ शराब पीने में और जुवा खेलने में लगाते होंगे क्यों कि उन धूर्त म्लेच्छों की धर्म मे कोई आस्था नही होती । वह लोग जो कभी मेरे पीछे-पीछे चला करते थे शायद आज उन मैं राजाओं और मंत्रियों के पीछे पीछे चलते होंगे । तभी वहां समाधि नाम का वो वैश्य आगया और राजा ने उससे उसका परिचय और इस आश्रम पर आकर रहने का कारण पूछा ।

उस वैश्य ने कहा राजन मेरा नाम समाधि है । मुझे मेरे पत्नी और पुत्रों ने धन के लालच में आकर घर से बाहर निकाल दिया है फिर भी मेरा मन उन्हीं की चिंता में लगा है ।  मैं यही सोचता रहता हूं कि वह लोग खुश है या नहीं ,अपने पत्नी और पुत्रों के प्रति मेरा मन कठोर नहीं हो पाता मैं यह बात अच्छी तरह से जानता हूं कि इनके गुणों में दोष है फिर भी मेरा मन उन्हीं के चिंता में लगा है किसी कारणवश मेरे मन को तनिक भी चैन नहीं है और मैं बहुत ही विचलित हो गया हूं । दुराचारी और धूर्त लोग भी अपने परिजनों का त्याग नही कर पाते , मैं अपने परिवार के मोह बंधन में पड़कर चिंतित और दुखी हूं ।

समाधि नाम के वैश्य की अपने परिवार के प्रति ऐसे चिंता देख कर राजा सूरथ कहते हैं , जिन लोगों ने धन के लालच में आकर  तुम्हें घर से बाहर निकाल दिया है उन्हीं के प्रति तुम्हारे मन में इतना स्नेह है यह बड़े आश्चर्य की बात है । मेरी भी यही परिस्थिति है जो राज्य अब मेरा है ही नहीं मेरा मन भी सदा उसी के विचार में लगा रहता है । मैं सदा इसी विचार में डूबा रहता हूं कि मेरा अति परिश्रम से कमाया हुआ धन वे नए राजा किस प्रकार से खर्च कर रहे होंगे और जो लोग मेरे पीछे पीछे घूमा करते थे आज उन राजाओं के पीछे घूम रहे होंगे । वह हाथी जिसे मैंने बहुत प्यार से पाल रखा था पता नहीं उसका ध्यान रखा जा रहा होगा या नहीं  । यू बातचीत करके उन दोनों ने निश्चय किया कि वे सुमेधा मुनि से अपने इस मोह का कारण और दुख निवारण के उपाय पूछेंगे ।

अगले दिन राजा सूरत और समाधि नाम का वैश्य मेधा ऋषि के पास जाकर अपने मोह और दुख का का कारण पूछते हैं । तब ऋषिवर उन्हें कहते हैं कि संसार के सारे प्राणी भगवती महामाया की माया से मोहित हैं ।  उन्हीं के इच्छा के कारण सभी जीव मोह में पड़े रहते हैं और उन्हें देवी आदिशक्ति चरित्र तथा उनके हाथों से मारे गए दैत्यों की  कथा सुनाते हैं । मेधा ऋषि राजा और वैश्य को देवी के प्रसंग में , मधु कैटभ का वध , महिषासुर का वध , धूम्रलोचन का वध , चंड मुंड का वध और शुंभ निशुंभ के वध की कथा सुनाते हैं । देवी की यह सारी कथाएं सुनकर राजा और वैश्य के मन में देवी के प्रति भक्ति जागृत होती है और वह दोनों मेधा ऋषि से देवी की पूजा विधि और नवार्ण मंत्र जानकर उनकी आज्ञा लेकर जंगल में जाकर भगवती की आराधना आरंभ करते हैं ।

एक महीने तक वे दोनों देवी के हाथ से मारेगये दैत्यों से संबंधित  चरित्र का पाठ करते है जिससे उनके मन मे अटूट श्रद्धा जाग्रत होजाती है । अब उन दोनों का देवी की उपासना के अतिरिक्त दूसरा कोई कार्य नही था । एक वर्ष तक वे देवी के मंत्र का जप करते है और केवल फल खा कर ही रहते थे । दूसरे वर्ष में वे केवल सूखे पत्ते खा कर देवी की पूजा और मंत्र जाप करते है । तब उन दोनों को देवी स्वप्न में दर्शन देती है । अब वे देवी के साक्षात दर्शन पाने की इच्छा से ,तीसरे वर्ष में वे केवल हवा से ही जीवित रहकर देवी की उपासना करते है ।

इसतरह तीन वर्ष तक राजा और वैश्य दोनों ही भगवती महामाया की श्रद्धा पूर्वक उपासना करते हैं । जिससे प्रसन्न होकर देवी उन दोनों के सामने प्रकट होती है और राजा के इच्छा अनुसार उन्हें अपना राज्य वापस मिलने का वर देती है और कहती है राजन दस हजार वर्ष तक राज्य करके तुमारा शरीर शांत होजायेगा उसकेबाद तुम सूर्य के पुत्र बनकर सावर्णि नाम के मनु बनोगे ।  समाधि नाम के वैश्य को उसकी इच्छा के अनुसार मुक्ति प्रदान करने वाला ज्ञान देती है । देवी राजा और वैश्य को यूं वरदान देकर वहीं अंतर्धान होगयी ।

जब राजा देवी से वार पाकर मुनि से आज्ञा लेकर अपने नगर जा ही रहे थे कि उनके वे  मंत्री जो पहले शत्रु से हाथ मिला चुके थे आकर राजा के पैरों में गिर जाते है । वे कहते है महारज आपके वे शत्रु युद्ध मे मारेगये उनका विनाश होगया आप हमे क्षमा कर दीजिए । इसतरह राजा को देवी की कृपा से अपना राज्य मिल जाता है और मंत्रयों से उसका पहले जैसा ही संबंध हो जाता है । वैश्य भी अब घर परिवार त्याग कर तीर्थो की यात्रा करता हुआ जीवन व्यतीत करता है । उन तीर्थो में वह वैश्य सदा लोगों को देवी की कथा सुनाते रहता ।

संसार मे सर्वप्रथम समाधि नामके वैश्य और सुरथ राजा ने ही देवी की उपासना की थी । समाधि और सूरत को देवी की जो कथा मेघा ऋषि ने सुनाई थी वह संसार में दुर्गा सप्तशती के नाम से विख्यात है । दुर्गा सप्तशती के प्रकट होने की यह कथा अत्यंत ही पावन और भक्ति मुक्ति प्रदान करने वाली है । इस कथा के श्रवण से जो व्यक्ति दुखी है वह सुखी हो जाता है मोक्ष का अधिकारी बन जाता है ।



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