भगवती जगदंबा की कृपा से राजा सत्यव्रत को शाप से मुक्ति और राज्य प्राप्ति की कथा

राजा मान्धाता की उत्पत्ति पिता के कोख से हुई थी । स्वयं देवराज इंद्र ने जन्म के बाद इनकी रक्षा की थी । राजा मांधाता के वंश में अरुण नाम के एक राजा हुए , राजा अरुण के पुत्र का नाम सत्यव्रत था । उसके पास अटूट संपत्ति थी । राजकुमार सत्यव्रत स्वेच्छाचारी ,कामी ,लोभी और अत्यंत मुर्ख निकला । उस नीच राजकुमार को पिताजी ने किसी एक अपराध के कारण घर से बाहर निकाल दिया । फिर अन्य अपराधों के लिए वशिष्ट जी ने उसे शाप दिया, वशिष्ठजी ने कहा संसार में तू त्रिशंकु के नाम से प्रसिद्ध होगा और केवल अपना पैशाचिक रूप ही संसार को दिखा सकेगा ।

वशिष्ट जी का शाप लगते ही सत्यव्रत में पिशाचके सारे गुण आ गए । अब वह जंगल में जाकर वहीं पर एक कुटिया बनाकर रहने लगा । किसी एक ब्राह्मण ने सत्यव्रत को भगवती जगदंबा के मंत्र की दीक्षा दी । सत्यव्रत ने अब भगवती जगदंबा के उसी मंत्र का जाप करना आरंभ कर दिया । मंत्र जाप के प्रभाव से उसमें जो पिशाच के गुण आगए थे वे सभी चले गए और वह तेजस्वी हो गया । उसके शरीर में अपार तेज आगया और वह सभी प्राणियों में सम्मान पाने का अधिकारी भी बन गया ।

उसी समय की बात है नवाक्षर मंत्र जाप पूर्ण करने के बाद उसने हवन करने का मन बनाया । इसीलिए वह ब्राह्मणों के पास गया और ब्राह्मणों से कहा, ब्राह्मण देवता मैंने भगवती जगदंबा के नवाक्षर मंत्र का जाप किया है और उसके बाद हवन करवाना चाहता हूं । इसीलिए आप लोग मेरे इस हवन में होता का कार्य संभालकर, इस हवन को पूर्ण करके मुझपर कृपा कीजिए । सत्यव्रत की बातें सुनकर ब्राह्मण कहने लगे, तुम्हारे गुरु वशिष्ठने तुम्हें शाप दिया है और उन्होंने तुम्हें त्याग दिया है । इसीलिए हम तुम्हारा हवन नहीं कराएंगे । तुम्हारे द्वारा हवन कराकर हम तुम्हारे गुरु वशिष्टजी के क्रोध का भागी नहीं बनना चाहते ।  तुम यहां से चले जाओ, ऐसा कह कर ब्राह्मणों ने सत्यव्रत का हवन कराने के लिए मना कर दिया ।

ब्राह्मणों के इस व्यवहार से सत्यव्रत को बहुत दुख हुआ । वह सोचने लगा मेरा जीवन व्यर्थ ही है । पिता ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया, इसीलिए राजकुमार होने के पश्चात भी मैं राज्य से वंचित हो गया और यहां पर इस जंगल में आकर एक कुटिया बनाकर रह रहा हूं । मेरे गुरु ने भी मुझे शाप दे दिया और उसी शाप के कारण आज संसार में सब लोग मुझे उपेक्षा की दृष्टि से देख रहे हैं । अब मुझे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है । भगवती जगदंबा की मैंने आराधना की और जब मैं उन भगवती जगदंबा के लिए हवन करने की इच्छा प्रकट की वह भी पूरी  नहीं हो सकी । मेरे इस ऐसे जीवन को धिक्कार है, ऐसा सोच कर राजकुमार सत्यव्रत ने आत्मदाह करने की इच्छा से कुछ लकड़ियां लेकर चिता बनाई और उसमें आग लगाकर कूदने के लिए तैयार हो गए ।

भगवती जगदंबा ने देखा, राजकुमार तो उदास होकर मरने को तैयार हो गया है । तब उसी समय भगवती जगदंबा राजकुमार सत्यव्रत के सामने प्रकट हो गई और उन्होंने कहा, राजकुमार यह क्या कर रहे हो तुम अपने प्राण को मत लो । धैर्य धारण करो कुछ ही समय में तुम्हारे पिता अपना संपूर्ण राज्य तुम्हें सौंप कर सन्यास लेकर वन जाने ही वाले हैं । आज से तीसरे दिन तुम्हारे राज्य के मंत्री तुम्हें ढूंढते हुए तुम्हें वापस ले जाने के लिए यहां आएंगे । इसीलिए तुम आत्मदाह करने का विचार त्याग दो । इतना कहकर भगवती जगदंबा अंतर्धान हो गई । भगवती जगदंबा का यह वचन सरकार सत्यवती बहुत प्रसन्न हो गया और उसने आत्मदाह करने का विचार त्याग दिया । 

देवर्षी नारद जो सदा त्रिलोकी में भ्रमण करते रहते हैं , सत्यव्रत के पिता के पास गए और उनसे उनके पुत्र की आत्मदाह की चेष्टा की बात कही । देवर्षि नारद की बात सुनकर सत्यव्रत के पिता राजा अरुण रोने लगे और उन्होंने कहा, देवर्षे मेरे पुत्र के एक भूल के कारण मैंने उसे घर से बाहर निकाल दिया । आज मेरे ही कारण वह बहुत कष्ट में है, राज्य पाने का संपूर्ण अधिकारी होने के बावजूद भी मैंने उसे राज्य से निकाल दिया । इसी कारणवश उदास होकर वह आज आत्मदाह करने के लिए तैयार हो गया । मुझसे यह बहुत ही बड़ा अपराध हो गया है । अब मैं अपने इस अपराध को ठीक करना चाहता हूं ।

देवर्षि नारद से इतना कहकर राजा अरुण ने अपने मंत्रियों को आदेश दिया, मंत्रियों तुम इसी क्षण जंगल में जाओ और मेरे दुखी पुत्र को मेरे पास लेकर आओ । मेरी इच्छा है कि मैं उसे सारा राज्य सौंप दूं और स्वयं सन्यास ले कर वन को चला जाऊंगा । राजा की बातें सुनकर मंत्रीगण उसी समय वन के लिए प्रस्थान कर गए । उन्होंने वहां सत्यव्रत को ढूंढ लिया और  कहा राजकुमार आपके पिताजी ने हमें यहां पर भेजा है । वे चाहते हैं कि आप पुनः राज्य को लौट आए और राज्य का कार्यभार संभाले । आपके पिता संपूर्ण राज्य आप को सौंपकर स्वयं सन्यास लेना चाहते हैं । इसीलिए आप हमारे साथ चलिए ।  मंत्रियों की बातें सुनकर सत्यव्रत राजमहल जाने के लिए तैयार हो गया । भगवती जगदंबा ने उसे इस विषय के बारे में पहले ही बता दिया था ।

जब राजा ने देखा मेरा पुत्र वापस आ गया है ,तब वे बहोत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे पुत्र आज तुम्हें देखकर मैं बहुत ही प्रसन्न हो गया हूं । मैंने तुम्हें राज्य से बाहर निकाल दिया किंतु आज मैं तुम्हें अपना यह सारा राज सौंपना चाहता हूं । इसीलिए तुम अब राज्य सिंहासन पर विराजने की तैयारियां करो । राजकुमार के कपड़े बहुत ही मलिन हो गए थे ,यह देखकर राजा ने अपने मंत्रियों से कहा तुम इसी समय मेरे पुत्र को ले जाओ और उसे स्नान कराके नए वस्त्र दो । इसके बाद राजा अरुण ने अपने पुत्र को राज सिंहासन पर बैठाया और उसका राज्याभिषेक कर दिया ।

राज्य छोड़कर जाने से पूर्व राजा अरुण ने अपने पुत्र सत्यव्रत को कुछ बातें कहीं । उन्होंने कहा, बेटा अपनी प्रजा का सदा ही पुत्रों की तरह पालन करना । शत्रु और मित्र चाहे कोई भी हो किसी पर भी सदा भरोसा नहीं करना चाहिए । शत्रु और मित्र दोनों के स्थान पर सदा गुप्तचरों को रखना चाहिए । सदा सत्य बोलो, प्रातकाल जल्दी उठना चाहिए और उठकर भगवती जगदंबा की आराधना करनी चाहिए । तुम तो परांबा के परम भक्त हो उनकी भक्ति से ही तुम्हें महर्षि वशिष्ठ के शाप से मुक्ति मिली है । सदा न्यायोचित मार्ग से ही धन अर्जन करना चाहिए और ब्राह्मणों का सदा आदर करना चाहिए । क्योंकि ब्राह्मणों के ज्ञान से ही राज्य का संचालन सरलता से हो सकता है । इसीलिए इनका कभी भी अपमान नहीं करना । क्योंकि जो राजा ब्राह्मणों का अपमान करता है उसका राज्य अवश्य ही नष्ट हो जाता है ।

पिता की है बातें सुनकर सत्यव्रत ने कहा, पिताश्री मैं अवश्य ही आपके बताए हुए मार्ग पर चलूंगा और न्याय पूर्वक अपनी प्रजा पर शासन करूंगा । अपने पुत्र की यह बात सुनकर राजा अरुण अति प्रसन्न हो गए । अपने संपूर्ण राज्य को सत्यव्रत को देखकर सन्यास लेकर वन चलेगए ।

भगवती जगदंबा की कृपा से सत्यव्रत को शाप से मुक्ति मिली थी और उन्हें राज्य की प्राप्ति हुई । आगे चलकर इनि राजा सत्यव्रत के पुत्र महाराज हरिश्चंद्र हुए जो संसार में सदा सत्य वचन बोलने के लिए प्रसिद्ध है ।



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