जानिए कैसे रुरुमुनि द्वारा मुक्ति मिली थी शाप से अजगर बने ब्राह्मण को

पूर्वकाल मे रुरु नाम के एक मुनि थे जिनका जन्म भृगु वंशी प्रमति की पत्नी प्रतापी के गर्भ से हुआ था । रुरुमुनि का विवाह स्थूलकेशी नाम के एक मुनि की पुत्री प्रमद्वारा से तय हुआ था । प्रमद्वारा नाम की ये कन्या स्वर्ग की अप्सरा मेनका और विश्वावसु की पुत्री थी जिसे जन्म के समय ही मेनका ने स्थूलकेशी मुनि के आश्रम के समीप छोड़ दिया था । स्थूलकेशी मुनि ने ही प्रमद्वारा का पालन पोषण किया था । जब रुरुमुनि और प्रमद्वारा के विवाह की तैयारी चल रही थी तभी एक दिन प्रमद्वारा अपने घर के आंगन में घूम रही थी । उसी समय अलसाया हुआ एक साँप आंगन में पड़ा था । जैसे ही प्रमद्वारा के पैर उसपे पड़े सांप ने उसे डंस लिया और प्रमद्वारा तुरंत ही मृत्यु को प्राप्त होगयी ।

जब रुरुमुनि को ये बात पता चली तो वे प्रमद्वारा के घर आये और वहां अपनी भावी पत्नी को मरा हुआ देख वे नदी तट पर जाकर यह प्राण लिया कि अगर उनके पुण्य कर्मों के फल  प्रमद्वारा जीवित नही हुई तो वे सर्पों का अंत कर देंगे और अपना प्राण त्याग देंगे । रुरुमुनि ने  आधी आयु देकर अपनी भावी पत्नी को जीवित कर दिया और अपने प्रण के अनुसार जब भी सांप दिखता वे हाथ मे लकड़ी लेकर सांप को मारते ।

एक समय की बात है जब रुरुमुनि भूमि पर विचर रहे थे तो उन्हें वहां एक अजगर दिखाई दिया । रुरुमुनि ने झट से लकड़ी हाथ मे लेली और उस अजगर पर वार करने लगे । लकड़ी की चोट कहते ही अजगर ने कहा , हे ब्राह्मण तुम मुझे क्यों मार रहे हो मैन तुमारा क्या बिगाड़ा है , मैं विषैला नही हूं केवल उन सांपो जैसे दिखता हूं । अजगर की बात सुनकर मुनि कहते है , मेरा नाम रुरु है ,पूर्वकाल में एक सांप ने मेरी पत्नी को डंस लिया था जिससे उसके प्राण चले गए थे । तभी मैन प्रण लिया था कि मैं सांपो को मार डालूंगा , तभीसे मैं सांपो को मारते हुए पृथ्वी पर विचर रहा हु । रुरुमुनि कहते है मैंने आजतक मनुष्य की तरह बात करनेवाला सांप नही देखा है , सच बताओ तुम वास्तव में को हो ।

अजगर कहता है , मुनिवर प्राचीन समय की बात है , मैं एक ब्राह्मण था , मेरा एक मित्र था जिसका नाम खेचर था । खेचर बड़ा ही धर्मात्मा , सत्यवादी और जितेंद्रिय ब्राह्मण था । मूर्खतावश मैन एक तृण का सांप बनाया और खेचर के समीप फेंक कर उसे धोके में डाल दिया था , उस समय वह अग्निशाला में बैठकर अग्निहोत्र कर रहा था । सर्पको देखकर वह आतंकित होगया । उसके सभी अंग कांपने लगे । उसमे घबराहट उत्पन्न होगयी । सर्प तृण का है , यह रहस्य खुलते ही उसने मिझे शाप दे दिया कि , अरे मूर्ख तूने मुझे तृण का  सर्प बनाकर डराया है इसीलिए तू भी सर्प बन जा । मैं उसी क्षण सर्प बन गया । 

जब अपनी भूल का अहसास हुआ तो मैंने मेरे मित्र से बहोत देर तक क्षमा मांगी । मेरे इस तरह क्षमा मांगने के बाद मेरे उस मित्र खेचर का हृदय द्रवित होगया और उसने कहा , आगे चलकर रुरुनाम के एक मुनि होंगे । सर्प के कांटने से उसकी पत्नी की मृत्यु होजाएगी तब वह सांपो को मारनेका प्राण लेगा और एक दिन जब तुम्हें मारेगा तो तुमारी मुक्ति होजाएगी ।

हे मुनिवर ब्राह्मण को हिंसा शोभा नही देती । अहिंसा ही उसका भूषण है इसीलिए तुम्हें हिंसा करना छोड़ कर अहिंसा को अपनाना चाहिए । मेरे मित्र के वचन आज सत्य होगये उसके कहे अनुसार तुम रुरुमुनि मिझे मुक्त करने के लिए आगये ।

रुरुमुनि के मारने के बाद वह ब्राह्मण अगजर की योनि से मुक्त होगया और रुरु ने सांपो को मारना बंद कर दिया । 

इस तरह रुरु मुनि द्वारा ब्राह्मण सर्प योनि से मुक्त हुए थे ।



Categories: देवी भागवत पुराण, महाभारत

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