भीष्म के जन्म की कथा

एक समय की बात है महर्षि वशिष्ठ के यहां अष्ठ वसु पधारे थे । वशिस्ठ ने उन सबका आदर सत्कार किया और सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध कराई । महर्षि के इस आदर सत्कार से सारे वसु अति प्रसन्न हुए । जब वे सब जा रहे थे तो धौ नाम के वसु की पत्नी ने,  महर्षि के आश्रम पर एक कामधेनु देखा और अपने पति से उसके बारे में पूछा । पत्नी की बात सुनकर धौ नामक वसु ने कहा, देवी इस कामधेनु गाय के दूध पीने के बाद मनुष्य को कभी कोई रोग नहीं होता और बुढ़ापा भी नहीं आता । उसकी बातें सुनकर पत्नी ने कहा कि आप कुछ दिनों तक इस गाय को हमारे साथ ले चलिए । पृथ्वी लोक में मेरी एक सखी है, मैं चाहती हूं कि मैं उसे इसका दूध पिलाऊँ जिससे वह सदा युवती बनी रहे और समस्त रोगों से मुक्त हो जाए ।

पत्नी की बातें सुनकर धौ नामक वसु ने अन्य वसुओं से चर्चा करके , महर्षि वशिष्ठ का अपमान करते हुए कामधेनु चुरा लिया । जब महर्षि वशिष्ठ वापस अपने आश्रम आए और वहां पर कामधेनु को नहीं पाया तो उन्होंने चारों ओर कामधेनु को ढूंडा । जंगल में गए , पहाड़ों में गए , सारे जगह पर ढूंढने पर भी उन्हें कामधेनु नहीं मिली । तब महर्षि वशिष्ठ ने अपने योग बल द्वारा ध्यान से जाना की धौ नाम के वसु ने अपनी कामधेनु गाय चुरा ली है और उनका अपमान भी किया है । तब और दूसरे बाकी वसु ने भी उनका साथ दिया है यह सब जानकर महर्षि वशिष्ठ ने वसुओं को शाप दे दिया कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा ।

जब सारे वसुओं को यह बात पता चली की वशिष्ठ ने उन्हें शाप दे दिया तो वह अत्यंत भयभीत हो गए और क्षमा मांगने के लिए वशिष्ठ के आश्रम पर आए । उनके सामने हाथ जोड़कर अपनी भूल स्वीकार की और शाप से मुक्त होने का मार्ग पूछा । तब वशिष्ठ ने कहा कि तुम सबको अवश्य ही मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा तुम सब का अपराध कम है इसीलिए तुम सबको जन्म लेते ही मनुष्य योनि से मुक्ति मिल जाएगी । किंतु धौ नामक इस वसु को कुछ कालतक मनुष्य रूप लेकर पृथ्वी लोक में रहना पड़ेगा । वषिष्ठ जी की बात सुनकर सारे वसु आश्रम से बाहर आए तो उन्हें वहां पर गंगा जी मिली , जो ब्रह्मा जी के शाप से पृथ्वी पर मनुष्य रूप लेने के लिए आई थी ।

सारे वसुओं ने गंगा जी से प्रार्थना की कि महर्षि से प्राप्त शाप से मुक्त  होने में वे उनकी सहायता करें । मनुष्य रूप में उनकी माता बन ने की  यह बात गंगा ने मान ली । आगे चलकर देवी गंगा  हस्तिनापुर नरेश  शांतनु से विवाह किया । विवाह करते समय गंगा ने  राजा शान्तनु  के सामने यह शर्त रखी कि वे कभी उने रोके और टोके नहीं । जिस दिन शंतनु अपनी शर्त तोड़  देंगे उसी दिन वे राजा को छोड़कर चली जाएंगी । शांतनु ने देवी गंगा की सारी शर्तें मान ली और उनसे विवाह कर लिया । कुछ समय बाद देवी गंगा का पुत्र हुआ लेकिन गंगा ने उस पुत्र  को गंगा में बहा दिया । इस तरह सात पुत्रों को गंगा जल में डुबोकर मार डाला परंतु शांतनु ने कुछ भी नहीं कहा ।

जब आठवें पुत्र ने जन्म लिया तो महाराज शांतनु अपने आप को नहीं रोक सके और उन्होंने गंगा से प्रार्थना की कि वे इस पत्र को नहीं मारे । अपनी शर्त को टूटी हुई देखकर, गंगा कहने लगी महाराज मैं भी इस पत्र को नहीं मारना चाहती आप मेरी की वास्तविकता जान ले मैं देवी गंगा हूं , जो ब्रह्मा के शाप से यहां पर आई थी । पुत्रों को मैंने मारा है , इसका कारण यह है कि , ये सब वास्तव में वशिष्ठ जी के द्वारा शापित वसु है ।  आठवां पुत्र भी धौ नाम का एक  शापित वसु है । यह कुछ काल तक आपका शापित पुत्र बनकर पृथ्वी लोक में रहेगा । अभी तो मैं इसे अपने साथ लेकर जा रही हूं । इसे सारी विद्या में पारंगत करके योग्य समय आने पर मैं आपको दे दूंगी ।

जब गंगा के आठवें पुत्र जिनका नाम देवरथ था । जब वे 16 वर्ष के हो गए तो गंगा ने उन्हें महाराज शांतनु को सौंप दिया । वही देवव्रत आगे चलकर अपने प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाये । इस तरह शापित धौ नाम की वस्तु ही विश्व के रूप में शांतनु के पुत्र हुए थे ।



Categories: महाभारत

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