जानिए क्यों हैहयवंशी क्षत्रियों ने भृगुवंशी ब्राह्मणों का संहार किया था

 

भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी के एक पुत्र थे । जिनका नाम हैहय था, यह एकवीर के नामसे भी जाने जाते थे । इन्हीं हैहय के नाम से, उनके कुल में उत्पन्न क्षत्रियों को हैहयवंशी कहा जाता है । इसी हैहयवंश में  कार्तवीर्य नाम के एक महान राजा हुए । इनकी सहस्त्र भुजाएं थी, इसीलिए इन्हें सहस्त्रार्जुन भी कहा जाता था । भगवान दत्तात्रेय द्वारा सहस्त्रार्जुन ने, देवी के मंत्रों की दीक्षा ली थी । दत्तात्रेय जी भगवान विष्णु  के अवतार माने जाते हैं । भगवती जगदंबा, राजा कार्तवीर्य की इष्ट देव थी ,  राजा सदा भगवती की  पूजा में व्यस्त रहते थे ।

राजा कार्तवीर्य का अधिकतर समय दान आदि देने में ही चला जाता था । उन्होंने बहुत सारे यज्ञ कराएं, उन यज्ञों में उन्होंने बहुत सारा धन भृगुवंशी ब्राह्मणों में बांटा  । राजा कार्तवीर्य के द्वारा, दक्षिणा स्वरूप दिया हुआ धन  पाकर ,सारे भृगुवंशी ब्राह्मण बहुत ही धनवान बन गए । कार्तवीर्यार्जुन ने बहुत समय तक समस्त भूमंडल पर राज किया । उसके बाद उनका स्वर्गवास होगया । कार्तवीर्यार्जुन के परलोक जाने के बाद, हैहय वंशी क्षत्रिय बिल्कुल निर्धन हो गए ।

एक समय की बात है , हैहयवंशी क्षत्रियों  को धन की बहुत आवश्यकता पड़ गई । तब वे क्षत्रिय धन मांगने के लिए भृगुवंशी ब्राह्मणों के पास गए । उन ब्राह्मणों ने यह कह दिया कि हमारे पास धन नही है । वे ब्राह्मण लोभ में पड़ गए थे । यह जानकर की, क्षत्रिय उन्हें भय पहुंचाएंगे, उन लोगो ने धन को गड्ढे खोदकर वहां छुपा दिया । दूसरे कुछ ब्राह्मणों ने अपने पास रखे धन को अन्य ब्राह्मणों के घर रख दिया । अपने यजमानों को कष्ट में देखकर भी उन ब्राह्मणों ने धन नही दिया । लोभ के कारण उनकी बुद्धि भृष्ट होगयी थी ।

उसकेबाद कुछ शक्तिशाली क्षत्रिय , जो धन के अभाव में कष्ट पा रहे थे । धन प्राप्ति के लिए स्वयं ही , भृगुवंशी ब्राह्मणों के आश्रम पर गए । तब उन्होंने देखा कि सारे ब्राह्मण भाग गए हैं । इसके पश्चात उन क्षत्रियों ने वहां की धरती खोदना आरंभ कर दी । वहां उन्हें धन प्राप्त हुआ । यह देख कर ,उन्होंने अन्य ब्राह्मणों के आश्रमों को भी खोदा । तब उन्हें  वहां पर बहुत सारा धन मिला ।  इस तरह क्षत्रियों ने बहुत सारी संपत्ति अर्जित कर ली । अब तो वह सारे ब्राह्मण बहुत ही भयभीत हो गए । वो ब्राह्मण क्षत्रियों के सामने गिड़गिड़ाने  लगे और ब्राह्मणों ने उन क्षत्रियों की अधीनता स्वीकार करें ।

यद्यपि भृगुवंशी ब्राह्मणों ने, क्षत्रियों की अधीनता स्वीकार कर ली थी,लेकिन फिर भी क्षत्रियों का क्रोध शांत नहीं हुआ ।  उन ब्राह्मणों को अभी भी क्षत्रियों द्वारा मार पड़ती रही । समस्त भृगुवंशी ब्राह्मण भयभीत होकर पर्वतों की कन्दराओं में चले गए । किन्तु वे हैहयवंशी क्षत्रिय वहाँ भी पहुंच गए । भृगुवंशियों का संहार करते हुए समस्त भूमंडल पर घूमने लगे । जहां कहीं भी भृगुवंशी दिख जाते , वे क्षत्रिय बाणों से उन्हें मार डालते ।  ऐसा करना उनका प्रधान कर्तव्य बन गया था । वे हत्यारे क्षत्रिय पाप करने पर ही तुले हुए थे । उनके इस घ्रणित कार्य से , गर्भवती स्त्रियाँ जोर जोर से रोने लगती ।

कुछ तीर्थवासी ब्राह्मणों ने उन हैहयवंशी क्षत्रियों से कहा । आपलोग ऐसा घ्रणित कर्म क्यों कर रहे हो । ब्राह्मणों पर इतना अत्याचार क्यों कर रहे हो , जिससे  ब्राह्मण स्त्रियों के गर्भ गिर गए । जब पुण्य अथवा पाप अति उग्र और असीम हो जाता है तो उसका फल मनुष्य को उसी जन्म में भुगतना पड़ता है । इसीलिये जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है उसे बहोत सोच समझकर कर्म करना चाहिए ।

उन तापससियों की बातें सुनकर क्षत्रिय कहने लगे । मुनिवरों आप नहीं जानते कि ये ब्राह्मण क्या कर चुके हैं । हमारे पूर्वज बहुत ही धार्मिक और ब्राह्मण भक्त थे । उन्होंने अपना सारा धन यज्ञ में और दान आदि में देकर खो दिया, इसी कारण से हम लोग निर्धन हो गए । कुछ आवश्यक कार्य के लिए जब हम इन ब्राह्मणों के पास धन मांगने के लिए गए ।  तब धन होते हुए भी इन लोगों ने हमें कह दिया कि हमारे पास धन नहीं है । ब्राह्मणों का कर्तव्य है की धन का उपयोग यज्ञ  में करें , पूजा संपन्न कराएं । दूसरों का भला करने में वह धन लगाएं । किंतु इन भृगुवंशी ब्राह्मणों ने, नातो कोई पूजा पाठ करया , ना ही उस धन से दूसरों का भला किया ।

अपने पास जो धन है उसका उपयोग धर्म कार्य में , भोग में, या दूसरों का कार्य सिद्ध करने में ही लगाना चाहिए।  केवल उसे जमा कर रखने में कोई लाभ नहीं होता । कंजूसी कर, धन जमाए रखने से उल्टा कष्ट ही होता है । ऐसा धन किस काम का जो आवश्यकता पड़ने पर ,अपने ,या किसी दूसरे का काम ना आ सके । मुनीवारों आप तो जानते ही हो कि ,धन तो समस्या की जड़ है । यदि लोग केवल धन संचय ही करते रहे तो इससे महान भय उत्पन्न हो सकता है । राजा का भय , या लुटेरों का भय, इस धन से उत्पन्न हो सकता है । जिसके पास अधिक धन होता है उसके ऊपर राजा और लुटेरों की दृष्टि सदा बनी रहती है ।

इन ब्राह्मणों ने, हमारे पूर्वजों के दिए हुए धन से कोई भी सत्कार्य नहीं किया, बल्कि उल्टा उसे जमीन में गाड़ कर रखा है । इसे ना ही हमें दिया है, जिससे हमें बहुत क्रोध आ गया है । हम लोग कुछ गलत नहीं कर रहे हैं । मुनियों को इस तरह कह कर, क्षत्रिय फिर से अपने को कार्य में लग गए ।

लोभ मनुष्य का बड़ा ही प्रबल शत्रु है । लोभ में पढ़कर मनुष्य अपने सारे संबंध भूल जाता है । लोभ में पड़े हुए व्यक्ति, ना तो अपने माता ,पिता ,पत्नी, पुत्रों को ही देखता है । आवश्यकता पड़ने पर वह लोभी मनुष्य उनकी हत्या करने को भी तैयार हो जाता है । लोभ में पड़ा हुआ व्यक्ति, ऐसा कौन सा दुष्कार्य है जिसे करने से पीछे नहीं हटता ।  यह सत्य है कि काम , क्रोध ,अहंकार मनुष्य के प्रबल शत्रु है । किंतु लोभ इन सब से भी अधिक बलवान है । लोभ में पड़े हुए व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है । इसीलिए धन के लोभ में पढ़कर  हैहयवंशी क्षत्रिय अपनी बुद्धि खो चुके थे । वे क्षत्रिय ब्राह्मणों के प्रति अपने क्रोध का त्याग करने में असमर्थ थे । 

अपना रक्षण करने के लिए भृगुवंशी स्त्रियों ने ,हिमालय जाकर देवी गौरी की मूर्ति बनाकर जगदम्बा की आराधना की ।देवी उनसे अति प्रसन्न हुई और  उसी भृगुवंश के एक स्त्री के गर्भ से , देवी के अंश से एक बालक हुआ । उस बालक के शक्ति के प्रभाव से , हैहय वंशी क्षत्रियों ने ब्राह्मणों को मारना बंद कर दिया ।

इस तरह अपने पूर्वजों द्वारा दान में दिए हुए, धन को प्राप्त करने  के लोभ में पढ़कर, हैहयवंशी क्षत्रियों ने भृगुवंशी ब्राह्मणों का संहार किया था ।



Categories: देवी भागवत पुराण

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