कृष्ण भाग ५ – कंसद्वारा देवकी और वासुदेव के छः पुत्रों की हत्या

 

पहले पुत्र के जन्म के बाद वसुदेवजी ने आकाशवाणी के समय दिए हुए वचन अनुसार उनके पुत्र को लेकर कंस की महल की और चल पड़े । मार्गमें जाते समय जनताने उनकी बड़ाई आरम्भ कर दी।

दर्शकोंने कहा, भाइयो! ऐसे उत्तम विचारसे सम्पन्न वसुदेवजीको देखो। केवल सत्य वचनसे बँध जानेके कारण ये इस बच्चेको मृत्युके मुखमें झोंकनेके लिये लेकर जा रहे हैं। ये महान् सत्यवादी हैं, कभी दूसरोंकी निन्दा नहीं करते। इन्हींका जीवन सफल है। अजी देखो, इनका यह कैसा अद्भुत कर्म है। इस प्रकार मार्गके लोगोंके मुखसे वसुदेवजीकी बड़ाईके शब्द निकल रहे थे। वसुदेवजी यथावसर कंसके महलपर पहुँच गये और तुरंतके उत्पन्न हुए उस बच्चेको कंसके सामने उपस्थित कर दिया। वह बालक मानव नहीं, बल्कि कोई देवता था। उस समय महात्मा वसुदेवजीके इस धैर्यको देखकर कंसके मनमें भी अत्यन्त आश्चर्य हो गया। उसने बच्चेको ले लिया और हँसते हुए यह वचन कहा -‘शूरसेनकुमार वसुदेव! तुम धन्य हो। तुमने मुझे पुत्र दे दिया, इससे तुम्हारी साधुता मैं जान गया। यह बालक मेरा काल नहीं है। आकाशवाणीने आठवें पुत्रसे मेरी मृत्यु बतायी है। इस बालकको मारना मेरा अभीष्ट नहीं है। अतः यह कुमार तुम्हारे घर जाय। महामते! तुम्हें चाहिये कि आठवाँ पुत्र मुझे अवश्य दे दो।’ यों कहकर दुराचारी कंसने उस बालकको वसुदेवजीके हाथमें सौंप दिया और कहा-‘यह बालक सकुशल घर लौट जाय।’ 

तदनन्तर वसुदेवजी प्रसन्नतापूर्वक उस बच्चेको लेकर अपने घरकी ओर चल दिये। परन्तु उन्हें मालूम था कि कंस बड़ा दुष्ट है और उसका मन उसके हाथमें नहीं है। वह किसी क्षण बदल सकता है। इसलिये उन्होंने उसकी बातपर विश्वास नहीं किया ⁠।⁠ कंसने निश्चिन्त होकर मन्त्रियोंसे कहा-‘निष्प्रयोजन इस बालकको क्यों मारा जाय? देवकीका आठवाँ पुत्र मेरा काल होगा-यह बात आकाशवाणीसे व्यक्त हुई है; अतएव इस पहले बच्चेको मारकर मैं क्यों पापका बोझ सिरपर लादूँ!’ उस समय जितने विचारकुशल श्रेष्ठ मन्त्री बैठे थे, उन सबके मुखसे ‘हाँ महाराज! बहुत ठीक है।’ ये शब्द निकल पड़े। फिर कंसने सबको जानेकी अनुमति दे दी और सभी अपने-अपने घर चले गये।

 सबके चले जानेपर मुनिवर नारदजी वहाँ पधारे,उनके आते ही कंसने अपने आसनसे उठकर उनका स्वागत किया तथा पाद्य और अर्घ्य आदिकी समुचित व्यवस्था की। तत्पश्चात् राक्षसराज कंसने मुनिसे कुशल पूछकर कहा-‘महाराज! आपने कैसे पधारनेकी कृपा की?’ तब नारदजीने हँसकर कंससे कहा—‘महाभाग कंस! मैं सुमेरु पर्वतपर गया था, वहाँ ब्रह्मा प्रभृति सभी प्रमुख देवता सावधान होकर बैठे थे। उनमें परस्पर परामर्श हो रहा था कि ‘वसुदेवकी धर्मपत्नी देवकीके गर्भसे देवाधिदेव भगवान् विष्णु तुम्हें मारनेके लिये जन्म धारण करेंगे।’ अतएव नीतिज्ञ होते हुए भी तुम देवकीके पुत्रको मारनेसे क्यों चूक गये?’ कंसने कहा-मैं देवकीके आठवें पुत्रको मारूँगा। आकाशवाणीने उसे ही मेरा काल बतलाया है। 

नारदजी बोले-महाराज! अच्छी-बुरी हर प्रकारकी नीतियोंसे तुम अपरिचित ही रह गये! देवताओंकी मायाका बल तो तुम जानते ही हो, फिर मैं तुम्हें क्या बताऊँ।‘कंस! व्रजमें रहनेवाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंशकी स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनोंके सजातीय बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी-सब-के-सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं।’ उन्होंने यह भी बतलाया कि ‘दैत्योंके कारण पृथ्वीका भार बढ़ गया है, इसलिये देवताओंकी ओरसे अब उनके वधकी तैयारी की जा रही है’ ⁠। नारदजी कहते है, महाराज, अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले शूरवीर पुरुषको चाहिये कि एक छोटेसे शत्रुकी भी उपेक्षा न करे। यदि जोड़ा जाय तो वे सभी बच्चे आठवें कहे जा सकते हैं। यह सब जानते हुए भी तुमने मूर्खतावश इस शत्रुको छोड़ दिया है। इस प्रकार कहकर श्रीमान् नारदजी तुरंत वहाँसे चल पड़े। 

जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंसको यह निश्चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुभगवान् ही मुझे मारनेके लिये पैदा होनेवाले हैं। इसलिये उसने देवकी और वसुदेवको हथकड़ी- बेड़ीसे जकड़कर कैदमें डाल दिया और उन दोनोंसे जो-जो पुत्र होते गये, उन्हें वह मारता गया । इसतरह कंस ने वासुदेव देवकी के छः पुत्रों को मार दिया । उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालकके रूपमें न आ गया हो ⁠।⁠ पृथ्वीमें यह बात प्रायः देखी जाती है कि अपने प्राणोंका ही पोषण करनेवाले लोभी राजा अपने स्वार्थके लिये माता-पिता, भाई-बन्धु और अपने अत्यन्त हितैषी इष्ट-मित्रोंकी भी हत्या कर डालते हैं ⁠।⁠

कंस जानता था कि मैं पहले कालनेमि असुर था और विष्णुने मुझे मार डाला था। इससे उसने यदुवंशियोंसे घोर विरोध ठान लिया ⁠।⁠ कंस बड़ा बलवान् था। उसने यदु, भोज और अन्धक वंशके अधिनायक अपने पिता उग्रसेनको कैद कर लिया और शूरसेन-देशका राज्य वह स्वयं करने लगा ⁠।⁠



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